Aigiri Nandini Lyrics In Hindi Meaning: संपूर्ण महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का भावार्थ

Aigiri Nandini Lyrics In Hindi Meaning: संपूर्ण महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का भावार्थ

महान संस्कृत भक्ति साहित्य में, aigiri nandini lyrics in hindi meaning एक अत्यंत पूजनीय स्थान रखता है। यह स्तोत्रम् माँ दुर्गा की शक्ति, वीरता और सौंदर्य का अनुपम वर्णन प्रस्तुत करता है। ‘ऐगिरि नंदिनी’ वास्तव में महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का शुरुआती पद है। यह देवी दुर्गा को समर्पित है, जो पर्वतराज हिमवान की पुत्री हैं और जिन्होंने दुष्ट महिषासुर का वध किया था। इसका पाठ करना भक्तों को आध्यात्मिक भक्ति और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। यह स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है और यह शक्ति उपासना का सार है।

Aigiri Nandini Lyrics In Hindi Meaning: संपूर्ण महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का भावार्थ

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का परिचय और महत्व

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् 21 श्लोकों का एक शक्तिशाली भक्ति गीत है। इसमें देवी दुर्गा के अनेक नामों, रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। प्रत्येक श्लोक देवी की असाधारण शक्ति और सौंदर्य को श्रद्धांजलि देता है। यह स्तोत्रम् विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान पढ़ा जाता है, जब अष्टभुजा देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह न केवल एक धार्मिक पाठ है, बल्कि यह संस्कृत काव्य और लय का अद्भुत उदाहरण भी है।

स्तोत्रम् के रचयिता और ऐतिहासिक संदर्भ

माना जाता है कि यह स्तोत्रम् 8वीं शताब्दी ईस्वी में महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य द्वारा लिखा गया था। आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म में शक्ति पूजा के महत्व को पुनर्जीवित किया था। उन्होंने देवी को परम शक्ति, यानी महाकाली के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस स्तोत्रम् की रचना उस समय हुई जब देवी उपासना का भाव चरम पर था। इसका मुख्य उद्देश्य भक्तों को यह याद दिलाना है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की विजय होती है।

Aigiri Nandini Lyrics In Hindi Meaning: संपूर्ण महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का भावार्थ

संपूर्ण ‘ऐगिरि नंदिनी’ स्तोत्रम् और हिंदी अर्थ

चूँकि यह स्तोत्रम् देवी दुर्गा की वीरता और सौंदर्य का संपूर्ण वर्णन है, इसलिए यहाँ इसके प्रारंभिक सात श्लोकों को उनके विस्तृत हिंदी अर्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह प्रारंभिक भाग ‘ऐगिरि नंदिनी’ के रूप में सबसे अधिक लोकप्रिय है।

श्लोक 1: देवी का परिचय

।।१।। अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते । गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरि कृते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे पर्वतराज की पुत्री (ऐगिरि नंदिनी)! तुम संसार को आनंदित करने वाली हो और सारा विश्व तुम्हारा मनोरंजन करता है। नंदी गण भी तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम विंध्याचल जैसे महान पर्वतों के शिखरों पर निवास करती हो और भगवान विष्णु के साथ क्रीड़ा करती हो। तुम विजयी देवताओं द्वारा पूजी जाती हो। हे भगवती! तुम नीलकंठ (शिव) की पत्नी हो, तुम्हारे अनेक परिवार और कुटुंब हैं, और तुमने बहुत से कार्य किए हैं। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

श्लोक 2: दुष्टों का नाश

।।२।। सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते । त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।। दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुम देवताओं पर वरदानों की वर्षा करती हो और कठिन से कठिन बाधाओं को दूर करती हो। तुम दुष्ट मुख वाले राक्षसों को सहन करने वाली और सदा प्रसन्न रहने वाली हो। तुम तीनों लोकों का पालन-पोषण करती हो और भगवान शंकर को संतुष्ट करती हो। तुम पापों को नष्ट करने वाली और पवित्र ध्वनियों से प्रेम करने वाली हो। तुम दनु के पुत्रों (दानवों) पर क्रोध करने वाली, दिति के पुत्रों पर क्रोध करने वाली तथा दुष्ट अहंकार को सुखाने वाली हो। हे सागर की पुत्री (या सिंधुसुते), महिषासुर का वध करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

श्लोक 3: कदंब वन की रानी

।।३।। अयि शतकण्ठ विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते । रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशौण्ड मृगाधिपते ।। निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपाटितमुण्ड भटाधिपते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुमने सैकड़ों शत्रुओं के धड़ों को खंडित किया और गजराजों की सूँडों को तोड़ दिया। तुम शत्रु हाथियों के गंडस्थल को चीरने में अत्यंत चंड (उग्र) पराक्रम दिखाने वाले सिंह पर सवार हो। तुमने अपनी भुजाओं के बल से शत्रुओं के सेनापतियों के सिरों को विखंडित और विदीर्ण कर दिया। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

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श्लोक 4: रणभूमि की महारानी

।।४।। अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते । चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।। दुरितदुरीह दुरासददुर्मुख दैत्यदमत्कर नंदिनुते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुम युद्ध में दुष्ट और उन्मत्त शत्रुओं का वध करने के लिए उत्पन्न हुई हो। तुम अजेय और अपार शक्ति धारण करती हो। तुम चतुर विचारों में निपुण भगवान शिव के दूतों को अपना सेनापति बनाती हो। तुम पापपूर्ण इच्छाओं वाले, दुर्गम और दुर्मुख दैत्यों का दमन करने वाली हो, जिनकी नंदी स्तुति करते हैं। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

श्लोक 5: दैत्यों पर क्रोध

।।५।। अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे । त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृताल विलेपकरे ।। दुमिदुमि तामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुम उन वीर शत्रुओं की पत्नियों को भी अभयदान देती हो जो तुम्हारी शरण में आती हैं। तुम तीनों लोकों के लिए कष्टदायक शत्रुओं के सिरों को काटती हो और उनका लेप लगाती हो। जब देवता “दुमि दुमि ता ता” की ध्वनि वाले नगाड़े बजाते हैं, तो उनकी महान ध्वनि से दिशाएँ भी गूँज उठती हैं। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

श्लोक 6: धूम्र नेत्रों का नाश

।।६।। अयि निजहुङ्कृति मात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रपते । समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीज लते ।। शिव शिव शुम्भ निशुम्भ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुमने केवल अपनी हुंकार मात्र से धूम्र विलोचन (धूम्राक्ष) जैसे महान राक्षस को नष्ट कर दिया। तुम युद्धभूमि में रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न होने वाली रक्त की लताओं की तरह हो (जो रक्तबीज के रक्त के हर बूँद से नया राक्षस बनने से रोकती हो)। तुम शिव-शिव कहते हुए, शुम्भ और निशुम्भ जैसे महान राक्षसों के वध से तृप्त हुए भूत और पिशाचों के साथ प्रसन्न रहने वाली हो। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

श्लोक 7: मधुर स्वर वाली देवी

।।७।। अयि मधु मधुनिरसिनी दैत्यविदारिणि धैर्यरते । जय जनवासिनि हास्यविलासिनी कैटभभञ्जिनि कैटभते ।। ललित कलामय शेलसुते सुर कुम्भ विकुम्भ निरञ्जनते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: हे देवी! तुमने मधु और कैटभ नामक दैत्यों का नाश किया। तुम धैर्य से भरी हुई हो। तुम लोगों के हृदयों में निवास करती हो और सदा मुस्कुराती रहती हो। तुम कैटभ का विनाश करने वाली हो। तुम ललित कलाओं से युक्त, पर्वतराज की पुत्री हो। तुम देवताओं के घड़ों को सुंदर बनाने वाली, शुद्ध और निर्मल हो। हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर बालों वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो!

स्तोत्रम् की महिमा: श्लोक 8 से 14 का गहन भावार्थ

यह खंड उन श्लोकों पर केंद्रित है जो युद्धभूमि में देवी की शक्ति और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं। ये श्लोक उनकी सुंदरता और भयंकरता के संयोजन को दर्शाते हैं।

श्लोक 8: युद्धभूमि में कंगन

।।८।। धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके । कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।। कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: युद्ध भूमि में जिनके हाथों के कंगन धनुष के साथ चमकते हैं। जिनके सोने के तीर शत्रुओं को विदीर्ण करके लाल हो जाते हैं और उनकी चीख निकालते हैं। चारों प्रकार की सेनाओं (हाथी, घोडा, पैदल, रथ) का संहार करने वाली अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाले बटुकों को उत्पन्न करने वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 9: नृत्य और संगीत का आनंद

।।९।। सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते । कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।। धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: देवांगनाओं के ‘तत-था थेयि-थेयि’ आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली। ‘कु-कुथ अड्डी’ विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले ताल वाले स्वर्गीय गीतों को सुनने में लीन। मृदंग की ‘धू-धुकुट’, ‘धिमि-धिमि’ आदि गंभीर ध्वनि सुनने में लिप्त रहने वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो। यह श्लोक देवी के कला और नृत्य प्रेम को दर्शाता है।

श्लोक 10: शिव को मोहित करने वाली

।।१०।। जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते । झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।। नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जय जयकार करने और स्तुति करने वाले समस्त विश्व के द्वारा नमस्कृत। अपने नूपुर के ‘झण-झण’ और ‘झिम्झिम’ शब्दों से भूतपति महादेव को मोहित करने वाली। नटी-नटों के नायक अर्धनारीश्वर के नृत्य से सुशोभित नाट्य में तल्लीन रहने वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 11: चन्द्रमा से सुंदर मुख

।।११।। अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते । श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।। सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

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भावार्थ: आकर्षक कान्ति के साथ अति सुन्दर मन से युक्त (सुमनःसुमनःसुमनः)। रात्रि के आश्रय अर्थात चंद्र देव की आभा को अपने चेहरे की सुन्दरता से फीका करने वाली। काले भंवरों के समान सुन्दर नेत्रों वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो। यहां देवी का रूपक चंद्रमा से भी श्रेष्ठ बताया गया है।

श्लोक 12: भील स्त्रियों से घिरी देवी

।।१२।। सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते । विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।। शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: महायोद्धाओं से युद्ध में चमेली के पुष्पों की भाँति कोमल स्त्रियों के साथ रहने वाली। चमेली की लताओं की भाँति कोमल भील स्त्रियों से जो झींगुरों के झुण्ड की भाँती घिरी हुई हैं। चेहरे पर उल्लास (ख़ुशी) से उत्पन्न, उषाकाल के सूर्य और खिले हए लाल फूल के समान मुस्कान वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 13: गजराज के समान चाल

।।१३।। अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्गजराजपते । त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।। अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जिसके कानों से अविरल (लगातार) मद बहता रहता है उस हाथी के समान उत्तेजित हे गजेश्वरी। तीनों लोकों के आभूषण, रूप-सौंदर्य, शक्ति और कलाओं से सुशोभित हे राजपुत्री। सुंदर मुस्कान वाली स्त्रियों को पाने के लिए मन में मोह उत्पन्न करने वाली मन्मथ (कामदेव) की पुत्री के समान। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 14: कमल दल सी कोमलता

।।१४।। कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते । सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।। अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जिनका कमल दल (पंखुड़ी) के समान कोमल, स्वच्छ और कांति (चमक) से युक्त मस्तक है। हंसों के समान जिनकी चाल है, जिनसे सभी कलाओं का उद्भव हुआ है। जिनके बालों में भंवरों से घिरे कुमुदनी के फूल और बकुल पुष्प सुशोभित हैं। उन महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो। देवी के इस स्वरूप में अनुपम सौंदर्य और पवित्रता निहित है।

देवी दुर्गा के स्वरूपों का वर्णन: श्लोक 15 से 21 का अर्थ

अंतिम खंड में, स्तोत्रम् देवी के दिव्य गुणों, उनकी कृपा और भक्तों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करता है। यह भक्ति की पराकाष्ठा है।

श्लोक 15: मुरली की ध्वनि

।।१५।। करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते। मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।। निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जिनके हाथों की मुरली से बहने वाली ध्वनि से कोयल की आवाज भी लज्जित हो जाती है। जो (खिले हुए फूलों से) रंगीन पर्वतों से विचरती हुयी, पुलिंद जनजाति की स्त्रियों के साथ मनोहर गीत गाती हैं। जो सद्गुणों से संपन्न शबरी जाति की स्त्रियों के साथ खेलती हैं। उन महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री की जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 16: कमर के वस्त्र और चंद्रमा

।।१६।। कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे। प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।। जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जिनकी चमक से चन्द्रमा की रौशनी फीकी पड़ जाए, ऐसे सुन्दर रेशम के वस्त्रों से जिनकी कमर सुशोभित है। देवताओं और असुरों के सर झुकने पर उनके मुकुट की मणियों से जिनके पैरों के नाखून चंद्रमा की भांति दमकते हैं। जैसे सोने के पर्वतों पर विजय पाकर कोई हाथी मदोन्मत होता है, वैसे ही देवी के उरोज (वक्ष स्थल) कलश की भाँति प्रतीत होते हैं। ऐसी हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, अपने बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 17: हजारों युद्धों की विजेता

।।१७।। विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते। कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।। सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: सहस्रों (हजारों) दैत्यों के सहस्रों हाथों से सहस्रों युद्ध जीतने वाली और सहस्रों हाथों से पूजित। सुरतारक (देवताओं को बचाने वाला) उत्पन्न करने वाली, उसका तारकासुर के साथ युद्ध कराने वाली। राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की भक्ति से समान रूप से संतुष्ट होने वाली। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 18: परमपद की प्राप्ति

।।१८।। पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे। अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।। तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: जो भी तुम्हारे दयामय पद कमलों की सेवा करता है, हे कमला (लक्ष्मी)। वह व्यक्ति कमलानिवास (धनी) कैसे न बने? हे शिवे! तुम्हारे पदकमल ही परमपद हैं। उनका ध्यान करने पर मैं परम पद कैसे नहीं पाऊंगा? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो। यह श्लोक आध्यात्मिक लाभों पर जोर देता है।

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श्लोक 19: स्वर्गिक सुख की अनुभूति

।।१९।। कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् । भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् । जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: सोने के समान चमकते हुए नदी के जल से जो तुम्हे रंग भवन में छिड़काव करेगा। वो शची (इंद्राणी) के वक्ष से आलिंगित होने वाले इंद्र के समान सुखानुभूति क्यों न पायेगा? हे वाणी (महासरस्वती)! तुममे मांगल्य का निवास है। मैं तुम्हारे चरण में शरण लेता हूँ। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 20: शिव नाम का धन

।।२०।। तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते। किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखीसु मुखीभिरसौ विमुखीक्रियते। ममतु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

भावार्थ: तुम्हारा निर्मल चन्द्र समान मुख, चंद्रमा का निवास है जो सभी अशुद्धियों को दूर कर देता है। नहीं तो क्यों मेरा मन इंद्रपूरी की सुन्दर स्त्रियों से विमुख हो गया है? मेरे मत के अनुसार तुम्हारी कृपा के बिना शिव नाम के धन की प्राप्ति कैसे संभव हो सकती है? हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो।

श्लोक 21: दीन पर दया

।।२१।। अयि मयि दीन दयालु-तया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे। अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।। यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।।

भावार्थ: हे दीनों पर दया करने वाली उमा! मुझ पर भी दया कर ही दो। हे जगत जननी! जैसे तुम दया की वर्षा करती हो, वैसे ही तीरों की वर्षा भी करती हो (दुष्टों के लिए)। इसलिए इस समय जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो। मेरे पाप और ताप दूर करो। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली, बालों की लता से आकर्षित करने वाली पर्वत की पुत्री! तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो। यह अंतिम श्लोक भक्त की पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।

ऐगिरि नंदिनी स्तोत्रम् के पाठ के लाभ

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का नियमित पाठ आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तरह के लाभ प्रदान करता है। इसे अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। यह व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और बल का संचार करता है। इसका पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं।

सबसे पहले, यह स्तोत्रम् मानसिक और शारीरिक शक्ति प्रदान करता है। यह भक्तों को जीवन की बाधाओं और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता देता है। देवी दुर्गा को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसलिए, उनके इस रूप का गुणगान आत्मविश्वास बढ़ाता है।

दूसरा, यह स्तोत्रम् भक्तों को भय और चिंता से मुक्ति दिलाता है। जो लोग अज्ञात भय या मानसिक अशांति से गुजर रहे होते हैं, उनके लिए इसका पाठ करना अत्यंत लाभकारी है। देवी भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।

तीसरा, महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् के पाठ से जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव आता है। श्लोक 18 और 19 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि देवी के चरण कमलों की सेवा करने वाला व्यक्ति कभी धनहीन नहीं होता। यह धन और मोक्ष दोनों का मार्ग प्रशस्त करता है।

चौथा, यह संस्कृत का एक साहित्यिक चमत्कार है। इसका लयबद्ध पाठ करने से मन शांत होता है। यह एकाग्रता को बढ़ाता है और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। यह पाठ मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पांचवां, यह स्तोत्रम् शत्रुओं और बुराई पर विजय प्राप्त करने में मदद करता है। महिषासुर पर देवी की विजय हमें यह सिखाती है कि हम अपने भीतर के अहंकार और दुर्गुणों को कैसे पराजित करें। यह आंतरिक युद्ध में सफलता सुनिश्चित करता है।

यह स्तोत्रम् केवल मंत्रों का संग्रह नहीं है। यह शक्ति, सौंदर्य, भक्ति और दर्शन का संगम है। यह आदि शंकराचार्य के गहन ज्ञान का प्रमाण है।

निष्कर्ष

Aigiri Nandini Lyrics In Hindi Meaning हमें माँ दुर्गा के विराट और मोहक स्वरूप का दर्शन कराता है। यह स्तोत्रम् हमें यह स्मरण कराता है कि परम शक्ति न केवल दुष्टों का संहार करती है, बल्कि अपने भक्तों पर अपार करुणा और दया भी बरसाती है। ‘ऐगिरि नंदिनी’ का नियमित जाप व्यक्ति को आंतरिक बल, समृद्धि और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। इसका हर श्लोक जीवन की चुनौतियों से लड़ने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

Last Updated on 02/12/2025 by Emma Collins

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