
ganesh chalisa in hindi with meaning हिंदुओं के बीच एक अत्यंत पूजनीय पाठ है, जो भगवान गणेश की स्तुति करता है। यह चालीस छंदों का भक्ति गीत न केवल उनकी महिमा का बखान करता है, बल्कि भक्तों को आध्यात्मिक महत्व भी प्रदान करता है। भगवान गणेश, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में जाना जाता है, की कृपा प्राप्त करने के लिए इस चालीसा का पाठ सर्वोत्तम मार्ग माना जाता है। इस शक्तिशाली पाठ की प्रत्येक पंक्ति में अष्ट सिद्धियाँ और मोक्ष का सार निहित है।

श्री गणेश चालीसा का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
गणेश चालीसा एक अत्यंत पवित्र ग्रंथ है जिसकी रचना अवधी भाषा में हुई है। चालीस छंदों के कारण ही इसे ‘चालीसा’ कहा जाता है। यह पाठ भगवान गणेश के गुणों, उनके जन्म की कहानी, उनके पराक्रम और उनके भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है।
चालीसा का नियमित पाठ मन को शांत करने, एकाग्रता बढ़ाने और जीवन में आने वाली हर बाधा को दूर करने में सहायता करता है। यह हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य या पूजा से पहले पढ़ा जाने वाला एक अनिवार्य पाठ माना जाता है।
यह माना जाता है कि जो भक्त चालीसा का पाठ अर्थ समझकर करते हैं, वे भगवान गणेश की कृपा के अधिक निकट पहुँचते हैं। इसका उद्देश्य केवल शब्दों को दोहराना नहीं, बल्कि उन भावनाओं और अर्थों को आत्मसात करना है जो इस स्तुति में निहित हैं।

गणेश चालीसा: संपूर्ण पाठ, अर्थ और व्याख्या
गणेश चालीसा की शुरुआत दो दोहों से होती है, जिसके बाद चालीस छंदों का मुख्य पाठ शुरू होता है। इन दोहों में भगवान गणेश का प्रारंभिक गुणगान किया गया है।
दोहा (Doha)
जय गणपति सद्गुण सदन,
करिवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण,
जय जय गिरिजालाल॥
व्याख्या: हे सद्गुणों के निवास, गज के समान मुख वाले, और दयालु भगवान गणपति! आपकी जय हो। आप विघ्नों को हरने वाले और शुभ कार्य करने वाले हैं। हे माता पार्वती (गिरिजा) के प्रिय पुत्र, आपकी बारंबार जय हो।
गणेश चालीसा के प्रारंभिक छंद (स्तुति खंड)
यह खंड मुख्य रूप से भगवान गणेश के दिव्य रूप, विशेषताओं और उनकी महिमा का वर्णन करता है।
चतुर्थी महिमा और रूप वर्णन
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गज बदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
व्याख्या: हे गणों के राजा गणपति! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप मंगल को भरने वाले और सभी कार्यों को शुभ करने वाले हैं। हे गजमुख (हाथी के मुख वाले), आप सुख प्रदान करने वाले हैं। आप विश्व के विनायक (सर्वश्रेष्ठ नायक) और बुद्धि के विधाता हैं।
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला॥
व्याख्या: आपकी टेढ़ी सूंड पवित्र और सुंदर है। आपके माथे पर लगा त्रिपुण्ड (तीन रेखाओं वाला तिलक) मन को मोहने वाला है। आपके हृदय पर मोतियों और मणियों की माला सुशोभित है। आपके सिर पर स्वर्ण का मुकुट और आपकी आँखें विशाल हैं।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
व्याख्या: आपके हाथों में पुस्तक, कुल्हाड़ी और त्रिशूल सुशोभित हैं। आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल प्रिय हैं। आपका शरीर सुंदर पीले वस्त्र (पीताम्बर) से सजा हुआ है। आपके चरण पादुकाओं से सुशोभित हैं, जो मुनियों के मन को भी प्रसन्न करती हैं।
Alt Text: गणेश चालीसा हिंदी और अंग्रेजी अर्थ सहित, भगवान गणेश का वक्र तुण्ड और पीताम्बर रूप का वर्णन
जन्म कथा और महिमा का वर्णन
यह खंड भगवान गणेश के जन्म की कथा, उनके परिवार और उनके विशिष्ट वाहनों का वर्णन करता है।
पारिवारिक परिचय और जन्म की पृष्ठभूमि
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व विख्याता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
व्याख्या: आप धन्य हैं, क्योंकि आप शिव के पुत्र और कार्तिकेय (षडानन) के भाई हैं। आप गौरी ललन (गौरी के प्रिय पुत्र) के रूप में विश्वविख्यात हैं। ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (अलौकिक शक्तियाँ) आपकी सेवा में चँवर (चंवर) डुलाती हैं। आपका वाहन मूषक (चूहा) आपके द्वार पर सुशोभित रहता है।
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
व्याख्या: मैं आपकी शुभ जन्म कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र और मंगलकारी है। एक समय की बात है, गिरिराज (हिमालय) की पुत्री माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की।
गणेश जी की उत्पत्ति
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
व्याख्या: जब वह अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण (द्विज) का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। माता पार्वती के तप से अत्यंत प्रसन्न होकर आपने उन्हें वरदान दिया।
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
व्याख्या: आपने कहा कि आपको विशाल बुद्धि वाला पुत्र प्राप्त होगा, और वह भी बिना गर्भ धारण किए। आप गणनायक, गुणों और ज्ञान के भंडार हैं, और सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूजे जाते हैं।
अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।
पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
व्याख्या: ऐसा कहकर आप अंतर्ध्यान हो गए और तुरंत ही पालने पर बालक के रूप में प्रकट हुए। जब आपने शिशु रूप में रोना शुरू किया, तो आपका मुख देखकर माता पार्वती के सुख की कोई सीमा नहीं रही।
सकल मगन सुख मंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन बरसावहिं॥
शंभु उमा बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥
व्याख्या: सभी लोग आनंदित होकर मंगल गीत गाने लगे। आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की। शिव और पार्वती ने खूब दान लुटाए। देवता और मुनि आपके दर्शन के लिए आने लगे।
शनि देव का आगमन और गजमुख प्राप्ति
यह खंड उस घटना का वर्णन करता है जब शनिदेव के देखने के कारण गणेश जी का सिर कट गया था और उन्हें हाथी का मुख प्राप्त हुआ।
शनि देव का संकोच
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
व्याख्या: जब इतना अधिक आनंद और मंगल का वातावरण देखा गया, तो शनि देव भी दर्शन करने के लिए आए। शनि देव ने मन ही मन अपने अवगुणों (शाप) को याद किया और बालक को देखना नहीं चाहा।
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि सकुचि सिर नाहीं।
का करिहौ शिशु मोहि दिखायहिं॥
व्याख्या: माता पार्वती को लगा कि शनि देव को उनके पुत्र का उत्सव पसंद नहीं आया। संकोच में आकर शनि देव ने कहा कि वे सिर झुकाए हुए हैं, और वे बालक को देखकर क्या करेंगे।
नहिं विश्वास उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
व्याख्या: माता पार्वती को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने शनि देव से बालक को देखने के लिए कहा। जैसे ही शनि देव की तिरछी दृष्टि का प्रकाश बालक पर पड़ा, बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
व्याख्या: पार्वती माता व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं। उनके दुःख की दशा का वर्णन करना असंभव है। कैलाश पर्वत पर हाहाकार मच गया कि शनि ने बालक का नाश कर दिया।
Alt Text: गजमुख धारी गणेश जी, कैलाश पर्वत पर उनकी महिमा और विघ्न विनाशक स्वरूप का चित्रण
गजमुख की स्थापना
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव शक्ति जगायो।
पूरण मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
व्याख्या: तुरंत ही विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर गए। उन्होंने अपने चक्र से हाथी का सिर काटा और उसे ले आए। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने शक्ति जागृत की। शंकर जी ने पूर्ण मंत्र पढ़कर उस गजमुख को धड़ पर स्थापित कर दिया।
नाम ‘गणेश’ शंभु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
व्याख्या: तब शिव जी ने आपका नाम ‘गणेश’ रखा और आपको प्रथम पूज्य तथा बुद्धि का भंडार (बुद्धि निधि) होने का वरदान दिया। जब शिव ने बुद्धि की परीक्षा ली, तो उन्होंने पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा।
बुद्धि की परीक्षा और वरदान
यह खंड गणेश जी द्वारा अपनी बुद्धि का प्रयोग करके शिव की परीक्षा को उत्तीर्ण करने और उन्हें प्राप्त वरदानों का वर्णन करता है।
भाई कार्तिकेय से श्रेष्ठता
चले षडानन भरमि भुलाई।
रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिणा कीन्हें॥
व्याख्या: आपके भाई कार्तिकेय (षडानन) भ्रमित होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए चले गए। लेकिन आप अपनी बुद्धि का उपयोग करके वहीं बैठ गए। आपने अपने माता-पिता के चरणों को पकड़ा और उनकी सात बार परिक्रमा की।
धनि गणेश कहि शिव हिय हरष्यों।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरष्यों॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहस्र मुख सकैं न गाई॥
व्याख्या: “धन्य है गणेश!” ऐसा कहकर शिव जी हृदय में हर्षित हुए। आकाश से देवताओं ने खूब पुष्पों की वर्षा की। आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई (प्रशंसा) शेषनाग भी अपने हज़ार मुखों से नहीं गा सकते।
दैवीय शक्तियाँ और शाप
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूँ कौन बिधि विनय तुम्हारी॥
भजत 'रामसुन्दर' प्रभुदासा।
जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
व्याख्या: मैं मतिहीन, दुखी और दोषों से भरा हूँ। मैं किस विधि से आपकी वंदना करूँ? प्रभु के दास ‘रामसुन्दर’ आपका भजन करते हैं। यह चालीसा जगत में प्रयाग (तीर्थ) और दुर्वासा ऋषि के आश्रम के समान पवित्र है।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
उठत बैठत तुमको ध्यावै।
विघ्न रहित हो सब सुख पावै॥
व्याख्या: हे प्रभु! अब इस दीन पर दया कीजिए। हमें अपनी शक्ति और भक्ति प्रदान कीजिए। जो भी व्यक्ति उठते-बैठते आपका ध्यान करता है, वह विघ्नों से रहित होकर सभी सुखों को प्राप्त करता है।
तुम्हरी शरण गहि रहै जो कोई।
भक्ति प्रेम युक्त होई॥
मनोरथ सब सिद्ध कर जाई।
पूर्ण करहु तुम सकल सहाई॥
व्याख्या: जो कोई भी आपकी शरण में आता है और भक्ति तथा प्रेम से युक्त होता है, उसके सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। आप उसकी सम्पूर्ण सहायता करते हैं।
शरण गहे तुमको जब जाई।
शत-शत जन्म की बाधा हटाई॥
नाम तुम्हारा जो कोई गावै।
जन्म-जन्म के दुःख मिटावै॥
व्याख्या: जब कोई आपकी शरण में जाता है, तो आप उसके सैंकड़ों जन्मों की बाधाओं को दूर कर देते हैं। जो कोई भी आपका नाम गाता है, वह जन्मों-जन्मों के दुखों से मुक्त हो जाता है।
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
दीन बन्धु बुद्धि विधाता॥
सूर्य श्याम शरण है तुम्हारी।
करहु सकल तुम मंगल भारी॥
व्याख्या: आप अष्ट सिद्धियों (आठ महान शक्तियाँ) और नव निधियों (नौ प्रकार के खजाने) को प्रदान करने वाले हैं। आप दीन-दुखियों के बंधु और बुद्धि को प्रदान करने वाले हैं। सूर्य श्याम आपकी शरण में हैं। आप सभी प्रकार का भारी मंगल कीजिए।
गणेश चालीसा पाठ का फल (फलश्रुति)
चालीसा का यह अंतिम खंड बताता है कि इस पाठ को पढ़ने से व्यक्ति को क्या फल प्राप्त होते हैं।
पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ
दोष तुम्हारा शशि निशि भावे।
चौथ का व्रत तुमको अति भावे॥
अति सुन्दर प्रभु दर्श तुम्हारा।
अति सुन्दर शुभ नाम तुम्हारा॥
व्याख्या: चंद्रमा (शशि) को रात में आपका दर्शन प्राप्त होता है (चंद्रमा पर लगा दोष आपके शाप के कारण है)। आपको चतुर्थी का व्रत अत्यंत प्रिय है। आपका दर्शन भी अत्यंत सुंदर है और आपका शुभ नाम भी अत्यंत सुंदर है।
कहत रामसुन्दर प्रभु दासा।
पूरण करहु सब जग आसा॥
नित नेम सों चालीसा पढ़हि।
तेहिसिद्धि प्राप्त करहीं॥
व्याख्या: प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं, आप संसार की सभी आशाओं को पूर्ण कीजिए। जो कोई प्रतिदिन नियम से इस चालीसा का पाठ करता है, वह सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
नित नेम सों चालीसा पढ़हीं।
तेहिसिद्धि प्राप्त करहीं॥
सुर-मुनि-संत सब वार वार।
जय जय जय गणेश गुहार॥
व्याख्या: जो नित्य नियम से चालीसा पढ़ते हैं, वे निश्चित रूप से सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं। देवता, मुनि और संत बार-बार गणेश जी से गुहार लगाते हुए उनकी जय-जयकार करते हैं।
नित नव मंगल गृह बसै।
जग में रहहिं सम्मानित॥
सम्बन्ध अपना सहस्र दश।
ऋषि पंचमी दिनेश॥
व्याख्या: उनके घर में नित्य नए मंगल का वास होता है और वे संसार में सम्मानित रहते हैं। ऋषि पंचमी के दिन जो इस चालीसा का पाठ करता है, उसे दस हज़ार संबंधों से लाभ प्राप्त होता है।
Alt Text: गणेश चालीसा संपूर्ण पाठ, अर्थ और व्याख्या, भक्तों को मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ और बुद्धि प्रदाता गणेश
गणेश चालीसा पाठ करने की सही विधि और समय
गणेश चालीसा का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए इसे सही विधि और समय पर पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। यह पाठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अभ्यास है जिसे श्रद्धा के साथ करना चाहिए।
सर्वोत्तम समय और दिन
बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन चालीसा का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (विनायक चतुर्थी) और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (संकष्टी चतुर्थी) पर भी यह पाठ करना शुभ होता है। पाठ का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से 6 बजे) या संध्या काल माना जाता है।
पाठ करने की तैयारी
पाठ शुरू करने से पहले शारीरिक और मानसिक शुद्धता आवश्यक है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल को साफ करें। यदि संभव हो, तो लाल वस्त्र या आसन पर बैठें, क्योंकि लाल रंग गणेश जी को प्रिय है।
भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। उन्हें दुर्वा घास, लाल फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करें। घी का दीपक जलाएँ और धूपबत्ती लगाएं। पाठ शुरू करने से पहले ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करना शुभ होता है।
उच्चारण और एकाग्रता
चालीसा का पाठ करते समय उच्चारण (प्रोनाउंसिएशन) स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। पाठ को बहुत तेज़ी से या बहुत धीरे नहीं, बल्कि मध्यम गति से और पूर्ण एकाग्रता के साथ करना चाहिए।
इसका अर्थ समझते हुए पाठ करने से आध्यात्मिक चेतना का स्तर बढ़ता है। पाठ के दौरान मन को इधर-उधर भटकने से रोकें और पूरी तरह से भगवान गणेश के स्वरूप पर केंद्रित करें।
गणेश चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ और प्रभाव
गणेश चालीसा का नियमित पाठ भक्तों के जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन लाता है, जो धार्मिक ग्रंथों और अनुभवों से सिद्ध हैं।
विघ्न निवारण और सुरक्षा
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। चालीसा का नियमित पाठ जीवन के हर क्षेत्र में आने वाली बाधाओं, समस्याओं और चुनौतियों को दूर करता है। चाहे वह करियर, शिक्षा, स्वास्थ्य, या व्यक्तिगत संबंध हों, चालीसा का पाठ एक सुरक्षा कवच का काम करता है।
माना जाता है कि यह पाठ नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी शक्तियों से भी व्यक्ति की रक्षा करता है। पाठ करने से भय और अनिश्चितता समाप्त होती है, और व्यक्ति निर्भीक होकर अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ता है।
बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि
गणेश जी बुद्धि के देवता हैं। चालीसा का पाठ छात्रों और उन सभी व्यक्तियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो ज्ञान और मानसिक स्पष्टता चाहते हैं। यह स्मृति शक्ति को बढ़ाता है और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करता है।
बुद्धि विधाता होने के नाते, गणेश जी भक्तों को सही और गलत के बीच भेद करने की क्षमता प्रदान करते हैं। यह आध्यात्मिक बुद्धि को भी विकसित करता है, जिससे जीवन के गहरे रहस्यों को समझने में सहायता मिलती है।
समृद्धि और अष्ट सिद्धि की प्राप्ति
चालीसा में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि भगवान गणेश अष्ट सिद्धि और नव निधियों के दाता हैं। नियमित पाठ करने वाला व्यक्ति भौतिक समृद्धि (धन, संपत्ति) और आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करता है। ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (सफलता) उनकी दासी हैं, जो भक्त के जीवन में सुख और सौभाग्य लाती हैं।
यह पाठ दरिद्रता को दूर करता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जो भक्त पूर्ण विश्वास से पाठ करते हैं, उनके जीवन में कभी किसी वस्तु की कमी नहीं रहती।
मानसिक शांति और संतोष
आज के तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति अत्यंत दुर्लभ है। गणेश चालीसा का शांत और लयबद्ध पाठ मन को स्थिरता प्रदान करता है। यह चिंता, अवसाद और बेचैनी को कम करने में सहायक है।
चालीसा का जाप करने से एक प्रकार की आंतरिक संतुष्टि और संतोष की भावना जागृत होती है। यह भक्तों को वर्तमान क्षण में जीने और छोटी-छोटी चीजों में खुशी खोजने में मदद करता है। यह भावना भक्त को मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
Alt Text: भगवान गणेश ध्यान मुद्रा में, उनके अवतार और उनके भक्तों को दिए गए विशाल बुद्धि के वरदान का प्रतीक
इस संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट है कि ganesh chalisa in hindi with meaning सिर्फ एक पाठ नहीं, बल्कि भगवान गणेश के प्रति संपूर्ण समर्पण का मार्ग है। यह चालीसा भक्तों को उनके जीवन में आने वाले सभी संकटों से मुक्ति दिलाकर उन्हें ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि से परिपूर्ण करती है। चालीसा का अर्थ समझकर पाठ करने से आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है और साधक संसार में मान-सम्मान प्राप्त करता है। विघ्नहर्ता की यह स्तुति हमें निरंतर शुभ कर्मों की ओर प्रेरित करती है और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता सुनिश्चित करती है।
Last Updated on 02/12/2025 by Emma Collins

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