incarnation meaning in hindi को समझना आज जरूरी है क्योंकि यह न केवल एक शब्द है, बल्कि पुनर्जन्म के गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक आयामों को खोलता है। यह लेख ‘Meaning in Hindi‘ श्रेणी के अंतर्गत आपको अवतार की अवधारणा, हिंदी में अर्थ, विभिन्न धर्मों में इसके महत्व, और पुनर्जन्म के सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाएगा। हम आत्मा और कर्म के संबंध को भी विस्तार से जानेंगे, साथ ही मोक्ष प्राप्ति में इसका क्या महत्व है। अंत में, आपको incarnation से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे, जिससे यह विषय आपके लिए पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।
अवतार: परिभाषा, व्युत्पत्ति और हिंदू धर्म में महत्व
अवतार, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘उतरना’ या ‘अवतरण’, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो ईश्वर के स्वेच्छा से पृथ्वी पर मनुष्य या अन्य रूपों में प्रकट होने को संदर्भित करती है। यह incarnation meaning in hindi का एक अभिन्न अंग है, जो भगवान के भक्तों के उद्धार और धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर आने की व्याख्या करता है। अवतार शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जहाँ ‘अव’ का अर्थ ‘नीचे’ और ‘तार’ का अर्थ ‘उतरना’ है।
हिंदू धर्म में, अवतारवाद की अवधारणा यह मानती है कि जब भी पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म का बोलबाला होता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥” अर्थात, “जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।” यह अवतार की अवधारणा का मूल सार है।
अवतार का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह भक्तों को ईश्वर के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। अवतारों के माध्यम से, भगवान मनुष्य के लिए अधिक सुलभ और समझने योग्य बन जाते हैं। वे अपने जीवन और शिक्षाओं के माध्यम से धर्म, न्याय और प्रेम का मार्ग दिखाते हैं। भगवान राम का अवतार धर्म और मर्यादा का प्रतीक है, जबकि भगवान कृष्ण का अवतार प्रेम, ज्ञान और भक्ति का प्रतीक है।
हिंदू धर्म में, भगवान विष्णु के दस मुख्य अवतारों (दशावतार) को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है: मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। ये अवतार विभिन्न युगों में प्रकट हुए और उन्होंने पृथ्वी को बुराई से बचाने और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रत्येक अवतार अपने समय की विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करता है और मानव जाति को एक नया संदेश देता है।

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विभिन्न हिंदू देवताओं के अवतार (Vibhinn Hindu Devataon Ke Avataar)
हिंदू धर्म में अवतार की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें विभिन्न देवताओं ने समय-समय पर धरती पर incarnation meaning in hindi को सार्थक करते हुए, धर्म की स्थापना और बुराई का नाश करने के लिए अवतार लिया है। यह मान्यता हिंदू धर्म को अन्य धर्मों से अलग करती है और इसकी विविधता को दर्शाती है।
विभिन्न हिंदू देवताओं के कई प्रसिद्ध अवतार हैं, जिनमें भगवान विष्णु के दस अवतार (दशावतार) सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि, ये सभी विष्णु के अवतार माने जाते हैं, जिनमें से प्रत्येक का एक विशिष्ट उद्देश्य था। भगवान राम का अवतार, उदाहरण के लिए, रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध करके धर्म की स्थापना के लिए था, जबकि भगवान कृष्ण का अवतार महाभारत के युद्ध में धर्म की रक्षा करने और भगवत गीता के माध्यम से ज्ञान का प्रसार करने के लिए था।
इसी प्रकार, देवी दुर्गा ने भी महिषासुर जैसे राक्षसों का वध करने के लिए विभिन्न रूप धारण किए, जिन्हें शक्ति के अवतार के रूप में पूजा जाता है। भगवान शिव के अवतार, जैसे हनुमान, वीरता, भक्ति और शक्ति का प्रतीक हैं, और उनकी पूजा व्यापक रूप से की जाती है। प्रत्येक अवतार न केवल एक ऐतिहासिक घटना है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है, जो हमें धर्म, न्याय और करुणा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
- भगवान विष्णु के अवतार: मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
- देवी दुर्गा के अवतार: विभिन्न रूपों में राक्षसों का वध करने के लिए।
- भगवान शिव के अवतार: हनुमान, वीरता, भक्ति और शक्ति के प्रतीक।
प्रत्येक हिंदू देवता का अवतार, अपने आप में एक अनूठी कहानी है, जो हिंदू धर्म की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है और incarnation के महत्व को उजागर करती है। ये अवतार हमें यह सिखाते हैं कि जब भी धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में आकर धर्म की रक्षा करते हैं।

अवतार और पुनर्जन्म में अंतर (Avataar Aur Punarjanm Mein Antar)
अवतार और पुनर्जन्म हिंदू धर्म में दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं, जो अक्सर भ्रमित होती हैं। जबकि दोनों में जन्म और मृत्यु का चक्र शामिल है, उनके बीच महत्वपूर्ण अंतर मौजूद हैं। पुनर्जन्म, जिसे incarnation meaning in hindi के संदर्भ में देखा जाए, एक सामान्य प्रक्रिया है जो सभी जीवों पर लागू होती है, वहीं अवतार एक विशेष घटना है जो केवल देवताओं से संबंधित है।
पुनर्जन्म, जिसे पुनर्जन्म या पुनर्जन्म का चक्र भी कहा जाता है, कर्म के सिद्धांत पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। आत्मा, कर्मों के बंधन में, एक शरीर से दूसरे शरीर में तब तक भटकती रहती है जब तक कि वह मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेती। यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है, जो कर्मों द्वारा संचालित होती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो अच्छे कर्म करता है, वह उच्च योनि (जैसे मानव) में जन्म ले सकता है, जबकि बुरे कर्म करने वाला व्यक्ति निम्न योनि (जैसे पशु) में जन्म ले सकता है।
इसके विपरीत, अवतार स्वेच्छा से लिया गया जन्म है। जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान स्वयं धरती पर अवतार लेते हैं ताकि धर्म की स्थापना कर सकें और दुष्टों का नाश कर सकें। भगवद्गीता में, भगवान कृष्ण कहते हैं: “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥” अर्थात, “हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूं।” भगवान का अवतार लेने का उद्देश्य हमेशा परोपकारी होता है। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए विभिन्न अवतार लिए, जैसे राम, कृष्ण, नरसिंह, आदि।
यहाँ कुछ मुख्य अंतरों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है:
- प्रकृति: पुनर्जन्म एक प्राकृतिक और अनिवार्य प्रक्रिया है, जबकि अवतार एक सचेत और स्वैच्छिक क्रिया है।
- उद्देश्य: पुनर्जन्म कर्मों के फल भोगने और मोक्ष की ओर बढ़ने से संबंधित है, जबकि अवतार धर्म की स्थापना और दुष्टों का नाश करने के लिए होता है।
- कर्ता: पुनर्जन्म सभी जीवों के लिए होता है, जबकि अवतार केवल देवताओं द्वारा लिया जाता है।
- नियंत्रण: पुनर्जन्म कर्मों द्वारा नियंत्रित होता है, जबकि अवतार भगवान की इच्छा से होता है।
संक्षेप में, पुनर्जन्म एक चक्र है जिसमें आत्मा कर्मों के अनुसार विभिन्न शरीरों में जन्म लेती है, जबकि अवतार भगवान का स्वेच्छा से मानव रूप में प्रकट होना है ताकि धर्म की रक्षा की जा सके। दोनों अवधारणाएँ हिंदू धर्म के मूल में हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और प्रकृति में महत्वपूर्ण अंतर हैं।

अवतार का उद्देश्य क्या है? (Avataar Ka Uddeshya Kya Hai?)
अवतार का उद्देश्य धर्म की स्थापना करना, बुराई का नाश करना और भक्तों को मुक्ति प्रदान करना है, जो कि incarnation meaning in hindi के परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। अवतार, ईश्वर का भौतिक रूप में अवतरण, विभिन्न युगों में मानव कल्याण के लिए होता है। यह न केवल एक ऐतिहासिक घटना है बल्कि एक सतत प्रक्रिया है जो ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
- धर्म की स्थापना: अवतार का प्राथमिक उद्देश्य धर्म की पुनर्स्थापना करना है। जब धर्म कमजोर हो जाता है और अधर्म प्रबल होने लगता है, तब ईश्वर अवतार लेते हैं ताकि धार्मिक मूल्यों और सिद्धांतों को फिर से स्थापित किया जा सके। उदाहरण के लिए, भगवान कृष्ण ने भगवत गीता में कहा है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, वे अवतार लेते हैं।
- बुराई का नाश: अवतार का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य बुराई और अन्याय का नाश करना है। राक्षस, अत्याचारी राजा और अन्य नकारात्मक शक्तियां जब पृथ्वी पर हावी हो जाती हैं, तो अवतार उनका नाश करके धर्म और न्याय की स्थापना करते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध करके बुराई का अंत किया था।
- भक्तों को मुक्ति: अवतार अपने भक्तों को मुक्ति और मोक्ष प्रदान करते हैं। वे अपने भक्तों को ज्ञान, भक्ति और कर्म के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान राम ने हनुमान और अन्य भक्तों को अपनी भक्ति से मुक्ति प्रदान की।
अवतार का उद्देश्य केवल तात्कालिक समस्याओं का समाधान करना नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करना है जो मानव समाज को सही दिशा में ले जाए। यह एक दिव्य हस्तक्षेप है जो हमें यह याद दिलाता है कि अच्छाई हमेशा बुराई पर विजयी होती है।
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आधुनिक संदर्भ में अवतार (Aadhunik Sandarbh Mein Avataar)
आधुनिक संदर्भ में अवतार की अवधारणा, incarnation meaning in hindi के संदर्भ में, प्राचीन धार्मिक विश्वासों और आधुनिक जीवन शैली के बीच एक दिलचस्प संवाद प्रस्तुत करती है। यह न केवल धार्मिक ग्रंथों में वर्णित ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में है, बल्कि यह भी है कि हम इन अवधारणाओं को आज कैसे समझते हैं और अपने जीवन में कैसे लागू करते हैं।
आजकल, अवतार की अवधारणा को कई तरह से समझा जा सकता है:
- सांस्कृतिक प्रतीक: अवतार, न्याय, धर्म और नैतिकता के प्रतीक के रूप में देखे जा सकते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि बुराई पर अच्छाई की जीत हमेशा संभव है।
- प्रेरणा का स्रोत: अवतार की कहानियाँ हमें मुश्किल समय में साहस और प्रेरणा प्रदान कर सकती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि कैसे चुनौतियों का सामना करना है और अपने मूल्यों के प्रति सच्चे रहना है।
- आत्म-साक्षात्कार का मार्ग: कुछ लोग अवतार को अपने भीतर की दिव्यता को पहचानने और उसे अभिव्यक्त करने के एक तरीके के रूप में देखते हैं। यह हमें अपने जीवन के उद्देश्य को खोजने और उसे पूरा करने के लिए प्रेरित करता है।
आधुनिक युग में, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रभुत्व है, अवतार जैसी आध्यात्मिक अवधारणाएँ हमें जीवन के गहरे अर्थ और उद्देश्य के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि भौतिक दुनिया से परे भी कुछ है, और यह कि हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देना चाहिए। इस प्रकार, incarnation meaning in hindi के माध्यम से हम न केवल एक शब्द को समझते हैं, बल्कि एक दर्शन को भी आत्मसात करते हैं।
उदाहरण के लिए, बहुत से लोग महात्मा गांधी को आधुनिक समय का अवतार मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलकर भारत को स्वतंत्रता दिलाई। इसी तरह, मदर टेरेसा को करुणा और सेवा का अवतार माना जाता है, क्योंकि उन्होंने अपना जीवन गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा में समर्पित कर दिया। ये उदाहरण दिखाते हैं कि अवतार केवल धार्मिक ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि हमारे आसपास के लोगों में भी मौजूद हो सकते हैं।
अवतार के प्रकार (Avataar Ke Prakaar) पूर्ण और आंशिक अवतार
अवतार, जिसका अर्थ है ‘उतरना’, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो ‘इन्कार्नेशन मीनिंग इन हिंदी’ को समझने में सहायक है। अवतारों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: पूर्ण अवतार और आंशिक अवतार, जिन्हें पूर्णावतार और आंशिक अवतार के रूप में भी जाना जाता है। यह वर्गीकरण, एक देवता के शक्ति और गुणों के स्तर पर आधारित है जो अवतार में प्रकट होते हैं।
पूर्ण अवतार, जिसे पूर्णावतार भी कहा जाता है, तब होता है जब एक देवता अपनी सभी शक्तियों और गुणों के साथ पूरी तरह से भौतिक रूप में प्रकट होता है। भगवान कृष्ण को विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है, क्योंकि वे अपनी सभी दिव्य विशेषताओं के साथ प्रकट हुए थे। ऐसे अवतारों का उद्देश्य अक्सर धर्म की पूर्ण पुनर्स्थापना और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखना होता है।
आंशिक अवतार, जिसे अंशवतार भी कहा जाता है, तब होता है जब एक देवता केवल अपनी कुछ शक्तियों और गुणों के साथ प्रकट होता है। परशुराम को विष्णु का आंशिक अवतार माना जाता है, क्योंकि उनमें भगवान विष्णु की कुछ ही शक्तियां विद्यमान थीं। इन अवतारों का उद्देश्य आमतौर पर किसी विशेष कार्य को पूरा करना या किसी विशिष्ट परिस्थिति से निपटना होता है, जो पूर्ण अवतार की आवश्यकता को पूरा नहीं करता।
दोनों प्रकार के अवतारों का उद्देश्य धर्म की स्थापना और बुराई का विनाश करना है, लेकिन उनके कार्यों और शक्तियों की सीमा अलग-अलग होती है। पूर्ण अवतार ब्रह्मांडीय स्तर पर कार्य करते हैं, जबकि आंशिक अवतार स्थानीय या व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, भगवान राम को विष्णु का पूर्ण अवतार माना जाता है, जिन्होंने रावण का वध करके धर्म की स्थापना की। इसके विपरीत, मत्स्य अवतार, जो विष्णु का एक आंशिक अवतार है, ने केवल मनु को जल प्रलय से बचाया था।
यहां पूर्ण और आंशिक अवतारों के बीच कुछ प्रमुख अंतर दिए गए हैं:
- शक्ति का स्तर: पूर्ण अवतार में देवता की सभी शक्तियां होती हैं, जबकि आंशिक अवतार में केवल कुछ शक्तियां होती हैं।
- उद्देश्य: पूर्ण अवतार का उद्देश्य धर्म की पूर्ण पुनर्स्थापना करना है, जबकि आंशिक अवतार का उद्देश्य किसी विशिष्ट कार्य को पूरा करना है।
- दायित्व का क्षेत्र: पूर्ण अवतार ब्रह्मांडीय स्तर पर कार्य करते हैं, जबकि आंशिक अवतार स्थानीय या व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप करते हैं।
इन वर्गीकरणों को समझकर, हम हिंदू धर्म में अवतार की अवधारणा की गहराई और जटिलता को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
अवतार: अन्य धर्मों में तुलनात्मक अवधारणाएँ (Avataar: Anya Dharmon Mein Tulnatmak Avadhaaranaen)
अवतार की अवधारणा, जिसका अर्थ है ‘incarnation meaning in hindi’ में ‘अवतरण’ या ‘प्रकट होना’, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, जहाँ यह माना जाता है कि भगवान विभिन्न युगों में धर्म की स्थापना और बुराई का नाश करने के लिए अवतार लेते हैं। यह जानना दिलचस्प है कि अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की अवधारणाएँ मौजूद हैं, जो भगवान या दिव्य शक्तियों के मनुष्यों के रूप में प्रकट होने की बात करती हैं। इस खंड में, हम हिन्दू धर्म के अवतार की अवधारणा की अन्य धर्मों में मौजूद समान अवधारणाओं के साथ तुलना करेंगे, जिससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि विभिन्न संस्कृतियों में इस विषय पर कैसे विचार किया जाता है।
ईसाई धर्म में, यीशु मसीह को ईश्वर का पुत्र और मानव रूप में ईश्वर का अवतार माना जाता है। (ईश्वरत्व का दावा) ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार, यीशु मसीह का जन्म मानव जाति के पापों के प्रायश्चित के लिए हुआ था और वे मृत्यु के बाद पुनर्जीवित हुए, जिससे मानव जाति के लिए मोक्ष का मार्ग खुल गया। यह अवधारणा हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के अवतारों के समान है, जो पृथ्वी पर धर्म की रक्षा और बुराई का नाश करने के लिए अवतरित होते हैं।
इस्लाम में, हालाँकि अल्लाह का कोई अवतार नहीं माना जाता, लेकिन यह माना जाता है कि अल्लाह ने पैगंबरों को धरती पर भेजा, जिनमें मुहम्मद सबसे महत्वपूर्ण हैं। (अंतिम पैगंबर) इन पैगंबरों को अल्लाह का संदेशवाहक माना जाता है, जो लोगों को सही मार्ग दिखाने और अल्लाह की इच्छा का पालन करने के लिए आए थे। यह अवधारणा हिन्दू धर्म में अवतारों के उद्देश्य के समान है, जहाँ भगवान अपने भक्तों को मार्गदर्शन देने और धर्म का मार्ग दिखाने के लिए अवतार लेते हैं।
बौद्ध धर्म में, बुद्ध को जागृत प्राणी माना जाता है, जिन्होंने निर्वाण प्राप्त किया और दूसरों को भी निर्वाण का मार्ग दिखाया। (संसार से मुक्ति) हालाँकि बुद्ध को ईश्वर का अवतार नहीं माना जाता, लेकिन उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जिन्होंने अपनी साधना और ज्ञान के माध्यम से उच्चतम स्तर की चेतना प्राप्त की। बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की अवधारणा भी है, जो ऐसे प्राणी हैं जिन्होंने बुद्धत्व प्राप्त करने का संकल्प लिया है और दूसरों की मदद करने के लिए पुनर्जन्म लेते रहते हैं। यह अवधारणा हिन्दू धर्म में आंशिक अवतारों के समान है, जहाँ भगवान अपनी शक्ति का एक अंश भेजकर किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करते हैं।
यहूदी धर्म में, अवतार की अवधारणा सीधे तौर पर मौजूद नहीं है, लेकिन मसीहा की अवधारणा है, जो भविष्य में आने वाले एक ऐसे व्यक्ति होंगे जो यहूदी लोगों को मुक्ति दिलाएंगे और शांति और न्याय का युग स्थापित करेंगे। (मुक्तिदाता) मसीहा को ईश्वर का अवतार नहीं माना जाता, लेकिन उन्हें ईश्वर द्वारा चुना गया और भेजा गया एक विशेष व्यक्ति माना जाता है, जो यहूदी लोगों के लिए उद्धार का मार्ग प्रशस्त करेगा।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि अवतार की अवधारणा, चाहे सीधे तौर पर हो या अप्रत्यक्ष रूप से, विभिन्न धर्मों में मौजूद है। हालांकि इन अवधारणाओं में कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं, लेकिन उनका मूल संदेश एक ही है: दिव्य शक्ति का मानव रूप में प्रकट होना, जिसका उद्देश्य मानव जाति को मार्गदर्शन देना, बुराई का नाश करना और धर्म की स्थापना करना है। अन्य धर्मों में इन समान अवधारणाओं की समझ हिन्दू धर्म में अवतार की गहरी समझ प्रदान करती है और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच समानताएं दिखाती है।
Last Updated on 10/01/2026 by Emma Collins

Hello there! I’m Emma Collins, your English instructor at Skilled English. Learning a new language doesn’t have to be stressful or confusing — and I’m here to prove it. With over 6 years of experience teaching English to beginners, my goal is to help you feel confident in speaking, writing, and understanding English step by step. Read more
