प्रीएक्लेम्पसिया गर्भावस्था की एक गंभीर जटिलता है, जो उच्च रक्तचाप और अक्सर यूरिन में प्रोटीन के साथ प्रकट होती है। यह आमतौर पर गर्भावस्था के 20 सप्ताह के बाद होती है और यदि अनुपचारित छोड़ दी जाए, तो माँ और शिशु दोनों के लिए जानलेवा हो सकती है। प्रीएक्लेम्पसिया का हिंदी में अर्थ समझना भारतीय गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि समय पर पहचान और चिकित्सकीय हस्तक्षेप गंभीर परिणामों को रोक सकता है। यह समस्या दुनिया भर में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के प्रमुख कारणों में से एक है।
प्रीएक्लेम्पसिया का अर्थ और परिभाषा

प्रीएक्लेम्पसिया का हिंदी में सीधा अर्थ “गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप की समस्या” हो सकता है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। इसे चिकित्सकीय भाषा में गर्भकालीन उच्च रक्तचाप विकार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसकी मुख्य पहचान दो बातों से होती है: पहला, गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद नया उच्च रक्तचाप (140/90 mmHg या अधिक) विकसित होना, और दूसरा, यूरिन में प्रोटीन की मौजूदगी (प्रोटीन्यूरिया)। कुछ मामलों में, लिवर या किडनी के कार्य में असामान्यता, प्लेटलेट काउंट में कमी, फेफड़ों में पानी भरना या दृष्टि संबंधी समस्याएं भी इसके साथ जुड़ी हो सकती हैं।
प्रीएक्लेम्पसिया के प्रकार
प्रीएक्लेम्पसिया को उसकी गंभीरता और समय के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- माइल्ड प्रीएक्लेम्पसिया: इसमें रक्तचाप 140/90 mmHg से अधिक लेकिन 160/110 mmHg से कम होता है और यूरिन में प्रोटीन की मात्रा कम होती है। लक्षण हल्के हो सकते हैं या नहीं भी दिख सकते हैं।
- सीवियर प्रीएक्लेम्पसिया: इसमें रक्तचाप 160/110 mmHg या उससे अधिक हो जाता है। यूरिन में प्रोटीन की मात्रा काफी बढ़ जाती है। सिरदर्द, दृष्टि में धुंधलापन, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, सांस लेने में तकलीफ और प्लेटलेट काउंट में गिरावट जैसे गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं।
- एक्लेम्पसिया: यह प्रीएक्लेम्पसिया का सबसे गंभीर रूप है, जिसमें मरीज को दौरे पड़ने लगते हैं। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है।
- HELLP सिंड्रोम: यह एक जानलेवा जटिलता है जिसमें लिवर एंजाइम बढ़ जाते हैं, प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं और लाल रक्त कोशिकाएं टूटने लगती हैं।
- उच्च रक्तचाप: यह प्राथमिक संकेत है।
- यूरिन में प्रोटीन: जो केवल लैब टेस्ट से ही पता चलता है।
- गंभीर सिरदर्द: जो आराम या सामान्य दर्द निवारक दवाओं से ठीक न हो।
- दृष्टि में बदलाव: धुंधला दिखाई देना, प्रकाश के चमकीले बिंदु दिखना, एकदम से दिखाई देना बंद हो जाना।
- पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द: विशेषकर पसलियों के नीचे दाईं ओर।
- मतली या उल्टी: गर्भावस्था की सामान्य मतली से अलग, विशेषकर दूसरी या तीसरी तिमाही में अचानक शुरू होना।
- सांस लेने में कठिनाई: फेफड़ों में तरल पदार्थ जमा होने के कारण।
- हाथों और चेहरे पर अचानक सूजन: विशेष रूप से आंखों के आसपास।
- शरीर के वजन में अचानक वृद्धि: एक या दो दिन में 1-2 किलो तक बढ़ना।
- रक्तचाप मापन: दो अलग-अलग अवसरों पर 4-6 घंटे के अंतराल पर उच्च रीडिंग की पुष्टि की जाती है।
- यूरिन टेस्ट: 24 घंटे के यूरिन सैंपल में प्रोटीन की मात्रा मापी जाती है, या एक स्पॉट यूरिन सैंपल में प्रोटीन-टू-क्रिएटिनिन अनुपात देखा जाता है।
- रक्त परीक्षण: किडनी और लिवर फंक्शन टेस्ट, प्लेटलेट काउंट और हीमोलिसिस (लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने) की जांच की जाती है।
- भ्रूण की निगरानी:
- अल्ट्रासाउंड: शिशु के विकास, एमनियोटिक द्रव की मात्रा और नाल के स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए।
- नॉन-स्ट्रेस टेस्ट (NST): शिशु की हृदय गति पर निगरानी।
- बायोफिजिकल प्रोफाइल: अल्ट्रासाउंड और NST का संयोजन।
- डॉपलर अल्ट्रासाउंड: गर्भनाल और शिशु के मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह का आकलन करने के लिए, विशेष रूप से गंभीर मामलों में।
- एक्लेम्पसिया: दौरे पड़ना, जो मस्तिष्क क्षति या कोमा का कारण बन सकता है।
- HELLP सिंड्रोम: लिवर और रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली जानलेवा स्थिति।
- स्ट्रोक: उच्च रक्तचाप के कारण मस्तिष्क में रक्तस्राव।
- हृदय रोग: भविष्य में हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
- अंग क्षति: गुर्दे, लिवर, फेफड़े, आंख या हृदय को नुकसान।
- भविष्य की गर्भावस्थाओं में प्रीएक्लेम्पसिया का खतरा: पहली बार प्रीएक्लेम्पसिया होने पर अगली गर्भावस्था में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है।
- इंट्रायूटरिन ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन (IUGR): नाल के माध्यम से अपर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन के कारण शिशु का विकास धीमा हो जाना।
- समय से पहले जन्म: माँ की स्थिति गंभीर होने पर शिशु को जल्दी जन्म देना पड़ सकता है, जिससे प्रीमैच्योरिटी की समस्याएं हो सकती हैं।
- गर्भनाल का अलग होना: नाल का गर्भाशय की दीवार से समय से पहले अलग हो जाना, जिससे भारी रक्तस्राव हो सकता है।
- स्टिलबर्थ: बहुत गंभीर और अनुपचारित मामलों में।
- नियमित प्रसवपूर्थ जांच: यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। रक्तचाप और यूरिन की नियमित जांच से शुरुआती पहचान संभव है।
- कम खुराक वाली एस्पिरिन: जिन महिलाओं को पिछली गर्भावस्था में प्रीएक्लेम्पसिया हुआ हो या एक से अधिक जोखिम कारक हों, उन्हें डॉक्टर की सलाह से गर्भावस्था के 12वें सप्ताह के बाद रोजाना कम खुराक वाली एस्पिरिन लेने की सलाह दी जा सकती है।
- कैल्शियम सप्लीमेंट: उन महिलाओं के लिए जिनके आहार में कैल्शियम की कमी है, सप्लीमेंट लाभकारी हो सकता है।
- स्वस्थ जीवनशैली: गर्भावस्था से पहले और उसके दौरान स्वस्थ वजन बनाए रखना, संतुलित आहार लेना और नियमित व्यायाम (डॉक्टर की सलाह से) करना।
- धूम्रपान और शराब से परहेज: ये जोखिम को और बढ़ा सकते हैं।
- पर्याप्त आराम और तनाव प्रबंधन: अत्यधिक थकान और तनाव से बचें।
- गलत धारणा: केवल पहली गर्भावस्था में ही प्रीएक्लेम्पसिया होता है। सच्चाई: यह किसी भी गर्भावस्था में हो सकता है, हालांकि पहली बार में जोखिम अधिक होता है।
- गलत धारणा: अगर रक्तचाप सामान्य है, तो प्रीएक्लेम्पसिया नहीं है। सच्चाई: कुछ दुर्लभ मामलों में, यूरिन में प्रोटीन या अन्य लक्षण बिना गंभीर उच्च रक्तचाप के भी हो सकते हैं।
- गलत धारणा: प्रसव के बाद प्रीएक्लेम्पसिया ठीक हो जाता है। सच्चाई: ज्यादातर मामलों में लक्षण कुछ दिनों या हफ्तों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ महिलाओं में प्रसव के बाद भी उच्च रक्तचाप बना रह सकता है और दीर्घकालिक जोखिम रहता है।
- गलत धारणा: घरेलू नुस्खों से प्रीएक्लेम्पसिया ठीक किया जा सकता है। सच्चाई: यह एक गंभीर चिकित्सकीय स्थिति है जिसके लिए डॉक्टरी उपचार और निगरानी जरूरी है। घरेलू उपचार केवल सहायक भूमिका निभा सकते हैं, इलाज नहीं।
- कभी भी डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें या न बंद करें।
- अचानक तेज सिरदर्द, दृष्टि में धुंधलापन, या पेट में तेज दर्द होने पर तुरंत अस्पताल जाएं।
- घर पर रक्तचाप मॉनिटर करते समय सही तकनीक का पालन करें और रीडिंग को डायरी में नोट करें।
- शिशु की हलचल में कमी महसूस होने पर डॉक्टर को सूचित करें।
- प्रसव के बाद भी नियमित फॉलो-अप जरूरी है, क्योंकि हृदय रोग का जोखिम बढ़ सकता है।
प्रीएक्लेम्पसिया के मुख्य लक्षण और चेतावनी संकेत
प्रीएक्लेम्पसिया के लक्षण कभी-कभी सामान्य गर्भावस्था की परेशानियों से मिलते-जुलते हो सकते हैं, इसलिए सतर्कता जरूरी है। कुछ महिलाओं में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते, इसीलिए नियमित प्रसवपूर्व जांचें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
प्रीएक्लेम्पसिया के कारण और जोखिम कारक

प्रीएक्लेम्पसिया का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इसकी शुरुआत नाल (प्लेसेंटा) के विकास में समस्या से होती है। नाल में रक्त वाहिकाएं सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पातीं, जिससे शरीर में सूजन और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कुछ महिलाओं को इसका खतरा अधिक होता है।
प्रमुख जोखिम कारक
| उच्च जोखिम वाले कारक | मध्यम जोखिम वाले कारक |
|---|---|
| पहली गर्भावस्था | 35 वर्ष से अधिक उम्र में गर्भधारण |
| पिछली गर्भावस्था में प्रीएक्लेम्पसिया का इतिहास | मोटापा (बीएमआई 30 या अधिक) |
| जुड़वां या तीन बच्चों की गर्भावस्था | गर्भावस्था के बीच लंबा अंतराल (10 वर्ष से अधिक) |
| गर्भावस्था से पहले से उच्च रक्तचाप, किडनी रोग, मधुमेह या ऑटोइम्यून रोग | प्रीएक्लेम्पसिया का पारिवारिक इतिहास (माँ या बहन को रहा हो) |
| इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) से गर्भधारण |
प्रीएक्लेम्पसिया का निदान और जांचें
प्रीएक्लेम्पसिया का निदान नियमित प्रसवपूर्व जांचों के दौरान किया जाता है। डॉक्टर निम्नलिखित जांचों की सलाह दे सकते हैं:
प्रीएक्लेम्पसिया का उपचार और प्रबंधन

प्रीएक्लेम्पसिया का एकमात्र इलाज गर्भावस्था का समापन और नाल का निकलना है। हालांकि, उपचार का लक्ष्य माँ और शिशु दोनों की सुरक्षा करते हुए, गर्भावस्था को यथासंभव लंबे समय तक सुरक्षित रखना है, ताकि शिशु के विकास के लिए अधिक समय मिल सके। उपचार योजना गर्भावस्था की अवधि और स्थिति की गंभीरता पर निर्भर करती है।
माइल्ड प्रीएक्लेम्पसिया का प्रबंधन
यदि गर्भावस्था 37 सप्ताह से कम है और स्थिति हल्की है, तो डॉक्टर निम्नलिखित सलाह दे सकते हैं:
घर पर देखभाल: अधिक आराम, बाईं ओर करवट लेकर लेटना ताकि गर्भाशय तक रक्त का प्रवाह बेहतर हो। नियमित निगरानी: घर पर रक्तचाप की जांच और शिशु की हलचल पर ध्यान देना। आहार: नमक का सेवन सीमित करना, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना। हालांकि, कैल्शियम की खुराक कुछ महिलाओं में जोखिम को कम करने में मददगार हो सकती है। नियमित डॉक्टरी जांच: सप्ताह में एक या दो बार जांच आवश्यक हो सकती है।
सीवियर प्रीएक्लेम्पसिया का उपचार
गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक है। उपचार में शामिल हो सकते हैं:
एंटीहाइपरटेंसिव दवाएं: रक्तचाप को सुरक्षित स्तर पर लाने के लिए, जैसे लेबेटालोल, निफेडिपिन। मैग्नीशियम सल्फेट: एक्लेम्पसिया (दौरे) को रोकने के लिए दिया जाने वाला टीका। यह प्रीएक्लेम्पसिया के इलाज की मुख्य दवा है। स्टेरॉयड इंजेक्शन: यदि गर्भावस्था 34 सप्ताह से कम है, तो शिशु के फेफड़ों के विकास को तेज करने के लिए। प्रसव प्रेरित करना या सी-सेक्शन: यदि माँ या शिशु की स्थिति खतरे में हो, तो डॉक्टर प्रसव की सलाह दे सकते हैं, भले ही गर्भावस्था पूरी न हुई हो। 37 सप्ताह के बाद, प्रसव ही मुख्य उपचार है।
प्रीएक्लेम्पसिया से जुड़ी जटिलताएं
यदि प्रीएक्लेम्पसिया पर नियंत्रण न हो, तो यह माँ और शिशु दोनों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है।
माँ के लिए जोखिम
शिशु के लिए जोखिम
प्रीएक्लेम्पसिया से बचाव और रोकथाम के उपाय

प्रीएक्लेम्पसिया को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उच्च जोखिम वाली महिलाओं में इसकी संभावना को कम करने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं।
प्रीएक्लेम्पसिया के बारे में आम गलतफहमियां और सावधानियां
सामान्य गलत धारणाएं
महत्वपूर्ण सावधानियां
प्रीएक्लेम्पसिया पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रीएक्लेम्पसिया किस अवस्था में सबसे अधिक होता है?
प्रीएक्लेम्पसिया आमतौर पर गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद होता है, ज्यादातर मामले तीसरी तिमाही में देखे जाते हैं। हालांकि, कभी-कभी यह प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद (पोस्टपार्टम प्रीएक्लेम्पसिया) भी हो सकता है।
क्या प्रीएक्लेम्पसिया से पीड़ित महिला सामान्य प्रसव कर सकती है?
हां, बहुत से मामलों में सामान्य प्रसव संभव है, बशर्ते माँ और शिशु की स्थिति स्थिर हो और कोई अन्य जटिलता न हो। हालांकि, कुछ स्थितियों में, जैसे कि गंभीर प्रीएक्लेम्पसिया या शिशु की स्थिति खराब होने पर, सीजेरियन सेक्शन की आवश्यकता पड़ सकती है। यह निर्णय डॉक्टर माँ और शिशु के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लेते हैं।
प्रीएक्लेम्पसिया का भविष्य की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
प्रीएक्लेम्पसिया का इतिहास होने से महिला को भविष्य में उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक और किडनी रोग का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, प्रसव के बाद भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, वजन नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम करना और समय-समय पर डॉक्टर से जांच करवाते रहना महत्वपूर्ण है।
क्या प्रीएक्लेम्पसिया शिशु के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है?
प्रीएक्लेम्पसिया से पैदा हुए शिशुओं में, विशेष रूप से समय से पहले जन्म लेने वालों में, शुरुआती वर्षों में विकास संबंधी देरी या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होने का खतरा अधिक हो सकता है। हालांकि, अधिकांश शिशु सामान्य रूप से विकसित होते हैं। उचित नवजात देखभाल और नियमित पेडियाट्रिक जांच से किसी भी समस्या का शीघ्र पता लगाया जा सकता है।
क्या प्रीएक्लेम्पसिया के बाद दूसरी गर्भावस्था सुरक्षित है?
अगली गर्भावस्था में प्रीएक्लेम्पसिया के दोबारा होने का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह जरूरी होगा या गर्भधारण असुरक्षित है। पहले से ही उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था के रूप में देखभाल की जाएगी। गर्भावस्था से पहले ही डॉक्टर से परामर्श करना, स्वस्थ वजन हासिल करना और डॉक्टर द्वारा बताई गई कम खुराक वाली एस्पिरिन लेना जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष
प्रीएक्लेम्पसिया गर्भावस्था की एक गंभीर चिकित्सकीय स्थिति है जिसके बारे में हर गर्भवती महिला और उसके परिवार को जागरूक होना चाहिए। इसका हिंदी में अर्थ और इसके लक्षणों को समझना समय पर पहचान की दिशा में पहला कदम है। नियमित प्रसवपूर्व जांचें, स्वस्थ जीवनशैली और डॉक्टर के निर्देशों का पालन करके इसके गंभीर परिणामों को रोका जा सकता है। यदि प्रीएक्लेम्पसिया का निदान हो जाए, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में उचित निगरानी और उपचार के साथ, अधिकांश महिलाएं स्वस्थ शिशु को जन्म देती हैं और स्वयं भी पूर्ण रूप से ठीक हो जाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करें और तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
Last Updated on 12/03/2026 by Emma Collins

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